अहं ब्रह्मास्मि – कर्म या धर्म

क्यों भटकते हो बाहर ,कभी खुद को तो जानो हे विधाता की रचना ,स्वयं को तो मानो   सुना है, अहं ब्रह्मास्मि ,शक्ति की पूरक हे शक्ति संचयकर्ता,रीति की नीति मानो   कृष्ण ने कर्म को ,धर्म से श्रेष्ठ बोला राम मर्यादित थे ,शब्द है ब्रह्म बोला   शब्द को …

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