मुहब्बत ए मजहब

चलो हम मुहब्बत का मजहब बनायें
अंधेरे घरों में भी दीपक जलाएं
चलो हम मुहब्बत का मजहब बनाएं
न काफिर हो कोई,विधर्मी कहे ना
मनः भाव में कोई कटुता रहे ना
रहे भाव वसुधा हो सम्पन्न मेरा
विधाता की रचना ,नमन करके आयें
चलो हम मुहब्बत का मजहब बनाएं
हो इज्जत बहन बेटियों का निरंतर
हर भाई की कोई कलाई न छूटे
संस्कारित ,सुपालित, सुसंस्कृत हो हर नर
न हिन्दू ,न मुस्लिम ,बस मानव बनायें

धर्मेंद्रनाथ त्रिपाठी “संतोष “

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