नारी – एक जवलंत सोच

काश ! जाति और धर्म, छोड़कर

मानवता की बातें होती

 

घर की लक्ष्मी होती सुरक्षित

कोई बेबस बहन न रोती

 

कितने निर्लज्ज हुए हम हैं

जो बलात्कार पर राजनीति है

 

सामान्य ,दलित में उलझे हम हैं

क्यों न्याय पर होती नहीं बहस है

 

जब बहन निर्भया हुई तार तार

तो ऐसी सबक सीखा देते

 

कर बीच सड़क शूली पर रख

इन्हें गिद्धों से नुचवा देते

 

मर गया हाय, डूबी है हया

बेशर्मी की कोई पार नहीं

 

मर रही रोज बहने घुट घुट

पर इस कुकृत्य पर वार नहीं

 

जहाँ सीता घुट घुट कर जीये

और न्याय मंच रावण कृत हो

 

जहाँ कुम्भकर्ण सी सोई जनता

राम राज्य कैसे फिर हो ?

 

धर्मेन्द्र नाथ त्रिपाठी””संतोष”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to Top