बुद्धं शरणम् गच्छामि

अरे जब भष्मीभूत होना

तो फिर गुमान किये हैं क्यो

 

छोड़कर सब जाना तुझको

तो फिर अभिमान किये है क्यों

 

लगाया तन पर चंदन है

मगर मन मैल भरा पापी

 

भटक मंदिर मस्जिद या चर्च

मिले भगवान तुझे फिर क्यों

 

दोहरी जीवन जीने में

लगाए खूब ठहाके तुम

 

मगर जब हो हिसाब तेरा

तो फिर फरियाद सुने वो क्यों

 

इतराया धन पर खूब स्वांगि

बेच डाला अपना ईमान

 

लगाकर माइक चिल्लाओ

तेरा आवाज़ सुने वो क्यों

 

जरा एक बार तो बोलो तुम

मुझे है बुद्ध शरण जाना

 

करो स्वीकार सत्य सन्मार्ग

शांत,मन,चिन्ता हो फिर क्यों

 

 

श्री हरि: !!!प्रणाम

धर्मेंद्र नाथ त्रिपाठी””संतोष””

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