वेदना – एक विनम्र श्रद्धांजलि

यूं लगा मानो
सहस्त्रों युग बीत गए
आंखें पथरा गई हैं
अश्रु धार सुख गए
पुनः जन्म इस कुटुंब में हो


आश कर मन शांत है
पर हृदय की वेदना मे
देख ले ये टूट गई है
उम्मीदें अब छूट गई हैं

 

किस को बोलें मौन हूं बस
देख ले आ दिल की धड़कन
वो तेरा बचपन , सताना
दो दंत निकले,काट जाना


फिर खिलखिलाकर मुस्कुराना
यादे संजोए रखा हूं
अरमान सारा टूट जाना
विहवल मन , स्पष्ट भाव


देख सारी छूट गई हैं
उम्मीदें अब छूट गई हैं

 

समझ ले इन आसुओं का मोल कोई है नहीं
इस हृदय की वेदना का तोल कोई है नहीं
संतोष मन भी व्यग्र है,संतुष्टि मिलती है नहीं


भष्म तू तो हो गया,पर मिलन की आश ,है बुझती नहीं
पुत्र तू तो तेज निकला,छोड़कर हमें चल दिया
बीच राह कष्ट देकर मौत मुख में ले लिया


रोकने पर भी रुदन ,है वेदना रुकती नहीं
आस में बस वास की चिंगारी है बुझती नहीं


लगता है भाग्य की एक कड़ी फूट गई है
उम्मीदें अब छूट गई है

 

एक विनम्र श्रद्धांजलि

धर्मेन्द्रनाथ त्रिपाठी “संतोष “

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